कुछ नगमें….

“कुछ नगमें जिंदगी नहीं होते ….

लेकिन उनके बिना जिंदगी जिंदगी नहीं होती|”

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कुछ पांच साल पुरानी बात है।

मुझे पता नहीं आज मैं जो कुछ कहने जा रही हूं, वो पांच साल पहले कह पाते या नहिं| लेकिन तब शायद प्यार करती थी मैं उनसे|
तो जायज सवाल है आपका, कीं अब वो प्यार ख़त्म हो गया ?? या फिर अब वो प्यार नहीं रहा… ?

इन कुछ चंद सवालोंसे पहले मै उनके बारे में हलकासा कुछ बता दूं, तो शायद मुझे भी मेरे सवालों के जवाब मिलने मे आसानी हो जाये।

“जैसे जैसे उम्र बढ़ती जाती हैं, रिश्ता भी बड़ा होने लगता है और यकायक एक दिन आपको समझ आता है, आज तक जो था वो सिर्फ एक बदलाव था, अपने बढ़ती आयु का बदलाव। मोहब्बत नहीं |”

वैसा ही कुछ हमारे साथ भी हुआ…

उन दिनों का प्यार अनदेखे हो गया। एक साल हम दोनोंने भी उसे पुरे इतमिनान से कायम रखा। साथ ही में इस मोहब्बत को मिसाल बनाने कीं और जिंदगीभर साथ रेहने कि कसमें खाई। …लेकिन उन्हीं दिनों पलक झपकते और रोशनी आ जायें, तब मैने प्यार के अलावा भी जिंदगी होती है जाना|

जी हॉं | गलत थी मैं | लेकिन अगर प्यार को ही जिंदगी मान लेती तो इस जिंदगी की खूबसूरती को, सफर को, अहमियत को समझ ना पाती |

हॉं | कुछ बातें देर से जानी सही, लेकिन शायद वही वक्त था जब मैं उन बातों को देख या समझ पाती …..

उन्हीं दिनों मैंने लिखना शुरू किया|
अगर आज भी प्यार में होती तो शायद इस खूबसूरत, सुंदर एहसास को कभी लिख ना पाती |दिन-ब-दिन हमारी बातें कम होने लगी .. फिर एक दिन मैंने ना चाहते हुए उन्हें सच्चाई से वाकिफ किया …झगड़े हुए, ज़िंदगी बिखर गयी, हम का रिश्ता अब ‘मै’ और ‘तुम’ में बदल गया| सच कहूँ तो मुझे एहसास था की प्यार से परे जाकर भी जिंदगी है इसलिए शायद मुझे उतना दर्द नहीं हुआ लेकिन उनका दर्द मैं चाहकर भी बयान नहीं कर पाउंगी ..

मैं खुदगर्ज बन गई थी| मैं लिखना चाहती थी।
वो हर एक लम्हा, वो हर एक पल, वो हर एक दिन जो मैं उनके बिना लेकिन अलग तरीके से जीने जा रही थी | शायद इसी ‘अहं’ में बड़ी बेरहमी से मैं ये बात भूल गयी की रिश्तें में मैं अकेली नहीं थी।” उनकी राय मैंने पूछी नहीं और वो बतातें तब तक मैं रुकीं नहिं।

उन्हे तकलीफ हो रही थी …
मैं उन दिनों भी अंदाजा लगा सकतीं थीं इस बात का… क्यूंकी किसी लॉजिक के परे ये दिलों का जुड़ना होता है। युन्ही कह दिया और जुदा हो गये इतना कमजोर लफ़्ज़ नहीं ये ‘प्यार’ ।लेकिन उस मोड़ पे मुझे बिलकुल बुरा नहीं लग रहा था “शायद हमारा बिछडके मिलना ही प्यार है।” मुझे लग रहा था ..।

ऐसे ही दिन कटते गये, रातों के बाद सवेरा धूप छाँव बारिश सब कुदरत के हिसाब से सही था … । कुछ दिनों बाद एक अजीब अकेलापन महसूस होने लगा । उनसे बात करने को जी चाहता था लेकिन अपने आप को रोक रहीं थीं मैं, या शायद गिल्ट के कारण मैं उनका सामना नहीं कर पा रही थी।

इन्हीं दिनों दोस्त ने बताया शब्बू राइटर बन गया … (उन्हें में प्यार से शब्बू बुलाती थी।) मेरी आंखे खुली की खुली रेह गयी … मुझे लगा था पूर्णविराम तो वैसे भी लग गया होगा| प्यार मोहब्बत जहाँ छोड आयें वहा सिर्फ यादों मे बची होगी .. लेकिन इस प्यार ने फिर से हम दोनों को ‘बेस्ट बुक’ के प्रोग्राम में सामने लाकर खड़ा कर दिया … बहुत दिनों बाद वो सहमी आंखे, वो गुस्से वाला लाल फूद्दू नाक देख रही थी मै ..बरसो बाद इतना सुकून मिला था मुझे। एक ॲटीट्यूड था उनके चेहरे पे … उसे घमंड कहती तो पाप लगता मुझें। लेकिन मुझे सब कबूल था ।वो आके थप्पड भी मारते तो भी एक अल्फ़ाज़ ना निकालती मैं …

उस प्रोग्राम में मैं कहीं नही थी, मेरी मौजूदगी में सिर्फ जिस्म था , दिल तो कबसे उनके आधे हिस्से से जुड़ गया था। … बहुत देर के बाद आखिर में मैने उनसे बात करने की ठान ली , बड़ी अजीब घबराहट थी दिल में।.. जा ही रही थी कि स्टेज के बाजू से आवाज आई बेस्ट बुक अवॉर्ड २०१७ गोज टू ‘शाकिर खैर उर्फ शब्बू…’ शब्बू ….. ‘मेरा शब्बू’….. आंखें बंद करके मैंने उस नाम को कम-से-कम पचास बार ज़हन से लगाया। उस गुंजाइश के ठीक बाद मैने उनकी किताब का पन्ना देखना चाहा।

दुनिया का सबसे खूबसूरत एहसास होता है ये, मिस्टर शाकिर खैर ने आज भी किताब मेरे दिये हुये नाम से छापी … वो नाम बार-बार सुनने को जी चाह रहा था। कानों को तसल्ली, दिल को ठंडक मिल रही थी … |

आज उन्होंने साबित कर दिया, ख़ुदग़र्ज़ मोहब्बत से परे उनकी चाहत थी, जिसे उन्होंने छीना नहीं बल्कि सहमें से शब्दों में कायम रखा और जिसे आज पुरी दुनिया ने अप्रूव किया।

कल सुबह जब मैं नींद से जगी तो ऐसा लगा कल जो कुछ हुआ वो कोइ सपना था। कभी ना पूरा होने वाला सपना। लेकिन तभी यकिन दिलाने के लिये मेरे बाजू में एक खत पड़ा देखा।

ठीक पांच साल दो दिन तीन रातों बाद उनका खत आया था।

खत में सिर्फ इतना लिखा था,

“कैसी हो आप ?? ”

आंखों में आयी उस बूंद ने हमारे बरसों पुराने मिसाल नगमों को ताजा कर दिया, लंबी सांस ली, खूद को शांत किया और

“अधुरी हूँ” कहके हमने खत वापिस कर दिया …

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