ख्वाब इकठ्ठा कर …

थकेभरे जब कदम घर की उस सुनसान सड़क पर पड़ते हैं।
मैं याद करती हूं उसी खुद को जो कुछ साल पहले ऐसेहिं किसी काम पर जाते आदमी को देख कहती थी ” ऐसी खुद में ही घुटन दे ऐसी जिंदगी कौन जीता हैं भला ?”
मैं तो नहीं। … ”

आज उसी सड़क से गुजरते, मैं मेरे अंदर के ‘खुद’ को घुटन से निकाल कर फेंक देना तो चाहती हूं।
फिर जिंदगी दस्तक देकर कहती हैं,
जीना हैं तो खुद के सुकुन को बेचना ही होगा उन्ही सुनसान सड़कों पर।’
मैं चुप सी होकर खुद मैं ही छूप सी जाती हूँ|
बेबस हो जाती हूँ, एक एक कदम खुद पर बोझ बनकर चलती हूँ|
देखे सपनो को पूरा करते करते मैं कहीं गलत ही जगह आती हूँ|

वो जगह ‘ऑफिस’ होती है, जहाँ कई टूटे ख्वाबोंकी एक दुनिया होती हैं|
मन ही मन जिंदगी को अपने लैपटॉप की स्क्रीन पर जुटाए उसे काम समझकर एक एक दिन ढकेल देती हूं,  किसी आग की शम्स की तरह|

मैं उसी बिच पढ़ लेती हूँ मेरे ही कुछ पुराने मेल्स।
जहाँ कहीं मैं पूरी तरह से मौजूद और अपनी थी|

जहाँ से जब घर की और मुड़ती थी, जिंदगी इतनी खूबसूरत लगाती थी कि, घर की सिडिया दिखती ही नहीं थी|
आज जिंदगी से मुँह मोड़ कर मन करता हैं, घर के उस एक कोने में जहाँ देर रात जाकर मैं खुद जिस कोने में फेक देेती हूं, वही फेंक दू। और बस उसी जगह पर लेटे लेटे देख लूँ गुजरती उस जिंदगी को। वैसे भी ख्वाबोंको, सपनोंको पूरा करने के उसी चक्कर में गली गली भटकते इस रास्ते पर आ गए हैं | शायद कोई और गली भटक जाते खुद के ही गलती से, दुःख तो न होता खुद के सपनोंको मारने का। …

ये सभी ख्वाब, इकठ्ठा कर के मैं फिर लौटती हूँ घर की और, घर के उस बेड के कोने में जहां पर सुकुन मेरा इंतजार कर रहा होता है, लौटती हूं उस एक जगह पर जहां शांति से सांस ले सकु, लौटती हूं लेटने की लालसा लेकर|

तभी नजर जाती हैं, उसी सुनसान सड़क पर|
जहाँ कोई और बैठकर ऐसेही मुझे कोस रहा होता हैं मन ही मन,

क्या कहूं उसे, कि जिंदगी जीने के लिए जिंदगी का सुकुन बेचना जरूर था |

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