झेड़ ब्रिज की संध्या ।

हम मिले थे दोनों मुठा के किनारे झेड ब्रिज के ऊपर।
एक हड़बड़ाहट थी और कई बातें।

कॉलेज खत्म होने के बाद यह पहली मुलाकात थी।
कॉलेज में रोजाना मिलना रोज का हो गया था।
आज का मिलना पुराना लेकिन थरथराहट सा था।

हवा का झोंका दोनों के भीतर चल रहा था। खुद को खुद से लपेटने का प्रयास जारी था।
उसके ऑफिस से लौटने की जल्दी कम नहीं हो रही थी।
लेकिन मिलन का रंग आसमान में असंभव फेंका जा रहा था।

ना जाने कैसे कब एक स्पर्श की गुफ्तगू हवा के साथ आई। कुछ लम्हों को सहलाते सहलाते संदली सी महक चढ़ गई।
लोगों का गलत तरीके से या नजरिए से देखना बेशुमार चालू था।

परवाह छोड़े हम मेहसूस कर रहे थे उस ऊंचे ब्रिज और दुल्हन सी संध्या की प्रेम कहानी।

ओ तेरी। अचानक से एक नज़र गई पहचान के चाचा अंकल की और। काहे की बेपरवाही ?
हड़बड़ाहट और फुली सांस से दोनों ने वो झुंझला स्पर्श वहीं छोड़ा।
मैं बालों की ना बाहर आई शाख को पीछे करते वो अपने कपड़ों की इन सरसराते चल पड़े रास्तें से।

इतने बड़े शहर में एक सुकून का प्रायव्हसी पल नहीं मिलता यहाँ, खफा हो गए हम लोगों से। बड़ा आया नाम का शहर।
फिर भी हमारी मुलाकात में आज सिर्फ एक पल जिंदा था,
स्पर्श का हड़बड़ाहटी सुकून का पल।

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