आप आओगे ना.?

एक ही खाली संध्या थी। हम यूंही खाली बैठे थे। कुछ भी तो सोच नहीं रहे थे,चाय लगाई थी, साथ ही में दो बूंद कम चाय पत्ती डाली थी। 

जान और कान दोनों भी शम्स के ढलते सूरज के दिए को देख आसमान पर नाराज थे। क्योंकि आसमान जब भी नीला सफेद रंग बादलों पर डालता था, और उसकी चमक हरी पत्तियों पर गिरती थी, रास्ते की पटरियां जब सावले रंग में धुत हो जाती थी, हमारी नजर ठीक छह बजे लगने वाले सुनहरे मासूम प्रेम गीत पर टिक जाती थी, आंखो को उसी का इंतजार है।

भला और कितना इंतज़ार एक आशिक से करवाओगे, आशिक हैं कोई कैदी नहीं। चलो हमें कैद खाना भी मंजूर है, लेकिन यू किसी आशिक से इंतजार करवा कर, तुम मोहब्बत को सरे आम बदनाम ना किया करो। मोहब्बत इंतजार करती हैं क्योंकि तुमसे बेहद प्यार करती हैं।

लेकिन आशिक होकर तुम भी तो राजनीति कर रहे हो।आश्वासन देकर छूट जाते हो,नया दिन जब ढलने लगता हैं, मैं आम आशिक की तरह तुम्हारे आश्वासनों के पूरे होने की राह देखती हूं। 

ढलते सूरज से लेकर सावले रास्ते तक सभी इंतजार में रहते हैं तुम मोहब्बत जब लौट जाती हैं, तब पीछे मुड़कर तुम्हारे मोहब्बत का इजहार करते हो।

दो मोहब्बत एकबार मिल ही नहीं सकते क्या? तवज्जू है और तकदीर भी। उस दिन का इंतजार रहेगा। और उस दिन भी हमारी मोहब्बत आप ही का इंतजार करेगी। आप आओगे ना?

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