सपनों की बातें

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सपनो पर सीमा लगाओगे, तो कैसे आगे बढ़ोगे?

कहते हो, हम तो गरीब लोग हैं, हमारे वैसे शौक ही नहीं।

फिर कहते हो, हम तो वैसे हैं ही नहीं, ये हम जैसों के लिए नहीं हैं।

हमारी जिंदगी उनसे बेहद अलग हैं। ये अमीरों वाले सपने हैं।

सपने भी अगर अमीरी गरीबी में बाटोगे, तो अपनी किस्मत का बटवारा भी वैसे ही होगा।

तुम्हारे हिस्से का मांगने की ही बात आई, तो तुमने सपने भी मामूली देखे।

खुद के जिंदगी की सच्चाई से वाकिफ होना अलग बात हैं और अपने सपनों की ऊंचाई को लगाम लगाना अलग। बहुत बार इंसान अपनी जिंदगी का बोझ लेकर भविष्य की और देखता हैं,आज मौजूदा समस्याएं कल हो ना हो, लेकिन उनकी गिनती हमारे आनेवाले कल में जरूर करता हैं। हम जिंदगी को उतना कन्फ्यूज करते हैं जितना हमारा दिमाग होता हैं। हम कल शायद न रहने वाले टेंशन को भी आज ही न्योता भेज देते हैं।

कॉलेज के दिनों में हमें खुद की ज्यादा पहचान नहीं रहती, तब हम ना जाने कितने चौंका देने वाला सपने देखा करते थे। आज खुद की धुंधली औकात पता चल गई तो, अपने सपनों का लगाम भी पीछे खींच लिया। खुद को मौका तक नहीं दिया।

जिंदगी पर भरोसा रखो, ये जिंदगी उन्ही मौहोल्लो की तरह हैं, जो भरी भीड़ में हम सिर्फ खड़े भी रह जाए फिर भी आगे लेकर जाती हैं। तुम्हें सिर्फ विश्वास रखना हैं, जिंदगी पर, आनेवाले नए कल पर।

आज की हर वो चीज दोहराई जायेगी अगर आप उसे दोहोराओगे। जिंदगी ‘आदतों’ जैसी बिल्कुल नही होती। तुम उसे आदतों की तरह जीने लगते हो।

फिर किसी मोड़ पर जब जिंदगी बूढ़ी हो जाती हैं, तब तुम्हें कॉलेज में देखे, पुराने उड़ानों भरे सपने याद आते हैं, असीमित छलांगे याद आती हैं। लेकिन तब तक जिन्दगी अपने आप आदतों में बदल जाती हैं। इसलिए जिन्दगी को हद से परे सपने दिखाओ, जिंदगी का नयापन तुम्हे हर रोज नई जिंदगी दे सकता हैं।

– पूजा ढेरिंगे

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